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Showing posts from June, 2011

रास्ते का पत्थर

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वो,
रास्तेकापत्थर,
निखराहै, कितनी
ठोकरेंखाकर।

जो,
ठिठुरताठंडमें,
तपताहै, कड़क
धूपमें, अजर।

वो,
घूमताएकदिन,
पहुँचाशिवालय,
हो बच्चे के कर।

वो,
मुस्कुरातावक्तपे,
औरकभीफिर ,
इसभाग्यपर।

जो,
ठोकरेदेकरगए,
वोमिलेंहैं, देखो
सरझुकाकर।

प्यार के सूखे हुए फूल

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कुछदिनोंशहरसेबाहरथा।अतःनयीरचनाआनेमेंकुछदेरीहोगयी।

प्यारकेसूखेहुएफूलहैंकताबोंमेंअभी;
रौशनी उम्मीद की है दिल के चरागों में अभी।

मैं जल रहा हूँ कि जलना है मुकद्दर में मेरे;
बस तेरे प्यार के मरहम की जरूरत है अभी।

गैर तुझको मैं समझूं ये तो न मुमकिन है;
मुझको तूँ अपना बना ले ये रास्ता है अभी।

खोज ही लूँगा तुझे मैं बहता हुआ एक दरिया हूँ;
प्यास मुझमें समंदर कि जो बाकी है अभी।

मैं मर गया भी तो बस देखना ये चाहूँगा;
कि मैं मर के भी तुझमें कही बाकी हूँ अभी।