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Showing posts from December, 2012

चार आँखें थीं वो

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चार आँखें थीं वो
लगता था तस्वीर से बाहर निकल कर
सीधे भीतर झाँक रहीं हों अंतस तक
दो आँखे उम्र दराज थी
पर गजब की चमक थी अनुभव की शालीनता की
दो बिल्कुल युवा आँखे थी
उनमें चमक थी भविष्य के भीतर झाँकने की
अपने संबल से भविष्य रचने की
पर एक समानता थी दोनो में
दोनो ही जैसे सामने वाले के भीतर झाँक लेती हों
और सहसा ही स्तब्ध करती है मन को
जैसे सब को खुद से जोड़ लेना चाहती हों
पर अगले ही पल एक निर्मल एहसास
सुख और शांति

आईना झूठ हो गया मेरा

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आग-ए-दिल से धुआँ उठता ही नहीं; दिल का जलना नज़र आता ही नहीं.
आईना झूठ हो गया मेरा ; चेहरा उसका ये दिखाता ही नहीं.
साफ़ दिल पाक भी है मेरा; बाद उसके कोई भाता ही नहीं.
गैर मुमकिन था जमाना बदले; रवायतें मैं भी निभाता ही नहीं.
ये है तन्हा सफ़र 'मुसाफिर' का; हमसफ़र साथ वो आता ही नहीं.