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Showing posts from February, 2013

माँ फिर से अपना आँचल कर दो

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कितने सारे दर्द हैं
जिनको जीता हूँ
दुनिया कहती है
मैं बड़ा हो गया हूँ
खुश होता हूँ मैं
जब बच्चा होता हूँ
माँ फिर से अपना आँचल कर दो
माँ मुझ को फिर से बच्चा कर दो

आदमी भी बिक रहा है

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हमारे बाजार बड़े हुए हैं  खरीद फ़रोख़्त बढ़ गयी है
अब तो आदमी भी बिक रहा है
और उसका जमीर भी
सिक्के भारी होते थे
फिर भी नहीं खरीद पाते थे आदमी को
या कि उसके जमीर को
ये नया दौर है
वक़्त की तराजू में तौल दिए जाते है
हलके नोटों के बदले
हलके होते आदमी और उनका जमीर

फगुआ में रंग सबहु के लागी

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एनहू के लागी ओनहू के लागी; फगुआ में रंग सबहु के लागी.
देवरो के लागी जेठओ के लागी; फगुआ में रंग सबहु के लागी.
ससुरो के लागी ससुयो के लागी; फगुआ में रंग सबहु के लागी.
जवनको के लागी बुढाओ के लागी; फगुआ में रंग सबहु के लागी.
चाहे केहू हाँसे चाहे केहु रोए; फगुआ में रंग सबहु के लागी.
डेराइब नाही लजाइब नाही; फगुआ में रंग सबहु के लागी.
चढ़ल बा फगुआ के बोखार हो सजनी; फगुआ में रंग सबहु के लागी.

मित्र अभिनव की एक कविता पढ़ने के बाद आए विचारों से उत्पन्न एक कविता

बुख़ार की चादर ओढ़कर सोये//एक हफ्ते से ज्यादा का वक़्त बीत चुका है.//आई ऐसे जैसे Camus के अभागे Stranger को सजा मुकर्रर कर दी गयी हो//वक़्त-बेवक्त टीसती है एक बीच से शुरू हुई कविता की तरह //इच्छाएं अगर स्थिर होती हैं तो उनमें कोई रंग नहीं होते//बुख़ार का रंग हल्का पीला होता है //बुख़ार बहुत गहरा हो तब भी//पर बुख़ार योग नहीं है. //ऐसे में इच्छाएं अपने केंद्र के चारों तरफ //या इधर उधर //इस तरह धीरे धीरे चक्कर लगाती हैं //जैसे हो गया हो उनका वीर्यपात //माथे पर स्वेद-बिंदु अलग अलग देशों के मानचित्र बनाते हैं //आये कोई राजकुमारी और जीत ले जाये सारा राजपाट.//हालाँकि मुझे ज्यादा तकलीफ खाँसने से है // तुम्हारा नाम भी तो कितना कठिन है //खांसते हुए ठीक से उच्चार नहीं पाता//खांसी नाम के जैसी संज्ञा नहीं है, पर है तो ध्वनि ही // ध्वनियाँ एक दूसरे की सौत बन गयी हैं.//मेरे संतूर से भी अब यदा कदा कुछ खांसती हुई ध्वनियाँ निकलती हैं //ध्वनियों का अलग अलग कोणों पर //अलग अलग समय से खुलना //खांसी को संगीत से अलग करता है.//दवा बदल दी है मैंने//कहते हैं पहली वाली से ज्यादा असरदार है//ठीक होने के रास्ते खुल…

जिंदगी के कुछ पन्ने कोरे ही रह जाने दो.

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"जीवन के कुछ दिन ऐसे गुज़र जाते हैं जैसे किसी कापी में कुछ पन्ने यूँ ही कोरे छूट गए हों ....... !!" फेसबुक पर  रवीन्द्र कुमार शर्मा जी की इस लाइन का असर है ये ........... अब और क्या कहें........


सांस आने दो थोड़ी हवा आने दो; कुछ दिनों को बस यूँ ही गुजर जाने दो.
मन के पेड़ों पर है, यादों के पत्ते बहुत; हवा से मिल के गीत पत्तों को गाने दो.
जो शाम गुज़री थी मन बहुत भारी सा था; ओस की बूंदे ज़रा आँखों से झर जाने दो.
जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने; बेवजह ही यूँ ही बस कोरे ही रह जाने दो.
मानता हूँ 'मुसाफिर' को चलना है बहुत; चलते चलते उसे थोड़ा तो ठहर जाने दो.

देखता हूँ ये कैसी मेरी लाचारी है.

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देखता हूँ ये कैसी मेरी लाचारी है. दिल की दरख्तों में तस्वीर तुम्हारी है;
कच्ची अमिया खाने का भी मन है; नाकसीर फूटने की तुझको बीमारी है.
दूर जा कर भी छूट न पाएगी; तेरे मेरे मन की लगी जो यारी है.
तुम हो तराजू लाए बाट नहीं लाये; 'प्यार' तौलने की तुम्हे बीमारी है.
कैसे मिलोगे और कहाँ ये बतला दो; नाम की नहीं मुझको तेरी दरकारी है.
राहें रहें मिलती 'मुसाफिर' बस क्या; मंज़िल की नहीं कोई नशातारी है.

दिल का हाल बयाँ आँखो से कर देते हो

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दिल का हाल बयाँ आँखो से कर देते हो.
बिन बोले कह देते हो कि तुम कैसे हो;

तुम अब तक घर की दीवारें देख रहे हो;
मुझ से मिलो ये तो पूंछो 'तुम कैसे हो'.

चेहरा मेरा देखोगे, न समझ सकोगे;
देखो दिल फिर न पूंछोगे 'तुम कैसे हो'.

कोई 'मुसाफिर' ही मंज़िल तक पहुँचेगा;
तुम राहों से उनका मुक़द्दर पूंछ रहे हो.

आग हो तुम

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मनीषा पांडे जी की बेबाकी का कद्रदान हूँ, वो समाज और उसकी रूढ़िवादिता और झूठे आडंबर के खिलाफ हैं. वो स्त्री के प्रति समाज की कुन्द हो गयी संवेदनशीलता के खिलाफ है. वो उस समाज को खंडित करती है जहाँ स्त्री को स्वतंत्रता नहीं है की वो कह सके की मुझे उस पुरुष के साथ सोने की इच्छा है वैसे ये स्वतंत्रता पुरुष को भी नहीं है, कि वो कह सके की मुझे उस स्त्री के साथ सोने की इच्छा है. सेक्स हमारे समाज मे एक परित्यक्त शब्द है, ये अलग बात है की सभी उसे जीना चाहते हैं. परंतु उनका विरोध मुझे इस मायने में ग़लत लगता है कि जिस व्यवस्था के प्रति वो विद्रोह कर रही है, वो उसी व्यवस्था से उत्पन्न है, वो भी एक परिवार में जन्मी हैं, और इसी समाज ने उन्हे यह स्वतंत्रता दी है, अपनी बात कहने की और इसी समाज मे लोग उन्हे स्वीकार रहे है वो इस समाज मे बदलाव की बात नहीं करती सोच परिष्कृत करने की बात नहीं कहती वो तो समाज को ख़त्म करने की बात करती है. इससे उनका खुद का और उन जैसी बहुत सारी स्त्रियों का अस्तित्व भी ख़तरे में है. समाज मे बदलाव का पक्षधर होना समाज से लड़ना लोगों की सोच के परिष्कृत होने की बात करना ठीक है, पर …

'प्रेम' घटित होता है

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पत्ते गिरते हैं पेड़ से
फिर से नये आते हैं

फूल मुरझाते हैं
नयी कोपलें फिर आती हैं

सागर में लहरें उठती हैं
और फिर सागर में मिल जाती हैं

हवायें सागर को स्पर्श करती हैं
और दूर निकल जातीं हैं

पत्तें, फूल, लहरें, हवायें
कोई कारण नहीं ढूढ़ते

यही उनका प्रेम है प्रकृति को
'प्रेम' घटित होता है ऐसे ही अकारण