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मोहब्बत तो फकीरी से ही जिंदा है

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जाने फिर क्यूँ मुझे वो याद आया; जाने फिर क्यू ये ख़याल आया.
जिस्म दो हैं, उसका और मेरा;  जिसमें बसता है एक ही साया.
सुबह और शाम एक ही तो है; बस ज़रा वक़्त का फासला पाया.
बेमियादी चाहतो का मतलब; तो मौत के बाद ही समझ आया.
जब भी उसकी याद से लिपटा; मैं खुद का कहाँ फिर रह पाया.
जितना दौड़ा पहुँचने को उस तक ; खुद को उतना ही दूर मैं पाया.
मोहब्बत तो फकीरी से ही जिंदा है; 'मुसाफिर' चाहकर न ज़ी पाया.


शब्दों के खिलाड़ी

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वो एक वक़्त था
जब उनके मन में थी एक आग
आग दुनिया को बदलने कि
या कि आग प्रेम की
खुद की दुनिया बदलने की
ऐसे समय में लिखे गये शब्द
जिनका एक अलग विन्यास था
वो 'कविता' थी
वक्त के साथ आग बुझने लगी
वक़्त के साथ कवितायें खोने लगी
पर शब्दों से खेलने का हुनर तब तक आ चुका था
अब मैं उन्हे शब्दों से खेलते देखता हूँ
वो आग जिसकी बात 'दुष्यंत कुमार' करते है
वो आग ख़त्म हो चुकी है
वो अब शब्दों के खिलाड़ी है
और वो खुद को 'कवि' कहलाना पसंद करते है