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ठहराव

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माँ का गर्भ
सुंदर जीवात्मा
मानव शरीर


दृष्टि ठहरी
दुनिया देखने
और पहचानने की


ठहरे और
ठिठके कदम
डग भरने को


हृदय प्रेम
ठहराव साँसों का
प्रेम अनुभूति


प्रथम कदम
वाषना प्रधान
ठहराव शरीर


गहन अनुभूति
प्रेम की उचईयाँ
ठहराव प्रेम


जीवन ठहराव
संगीत नृत्य प्रेम
परमात्मा


आत्मा परमात्मा
एक ही ठाँव
एक में ठहराव


साँसें उखड़ती
मृत्यु सजग
नयी यात्रा का पड़ाव

ठहराव

फ़ुर्सत में कहां हूं मैं

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मैं समंदर हूं कि हवा हूं मैं; नहीं हूं खुद में तो कहाँ हूं मैं|
लम्हें वो जिनको ज़ी नहीं पाया; उन ही लम्हों को जोड़ता हूँ मैं|
सांस बिखरी हों या तेरी यादें; एक तड़फ़ है जो ज़ी रहा हूं मैं|
एक अरसा हुआ देखे तुझको; अरसा पहले ये पल जिया हूं मैं|
मिलना फ़ुर्सत से सफ़र के बाद; 'मुसाफिर' हूं फ़ुर्सत में कहां हूं मैं|

कुछ साँसों को जिंदगी से अलग कर दूं

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चाहता हूं कुछ साँसें अपनी जिंदगी से अलग कर दूं
वो जो तुम्हारी यादों के साथ ली थी मैं ने
और जिनके साथ घुली हवा मेरे रक्त में समा गयी
जो मेरे रक्त के साथ सीने से होते हुए
मेरे दिल और दिमाग़ में अपनी जगह बना चुकी है
और जिसने तुम्हारे यादों का असर और गहरा कर दिया है
मैं चाहता हूं तुम्हारी याद का हर असर ख़त्म कर दूं
मैं चाहता हूं कुछ साँसों को अपनी जिंदगी से अलग कर दूं

इस दुनियावी सफ़र में अब रखा क्या है.

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सफ़र है जिंदगी, और यहाँ होता क्या है; जो भी मिलता है, वो भी मिलता क्या है.
जिंदगी के सफ़र पर निकले हो तुम; सिवा मौत के अपना पराया क्या है.
एक मोहब्बत ही तो है दिल मे तेरे; लूटा दे यूँ भी पास तेरे रखा क्या है.
समझना था राह की मुश्किलों को तुम्हें; और समझना था की ये दुनिया क्या है.
घर को लौट ही चल 'मुसाफिर' अब तूँ; इस दुनियावी सफ़र में अब रखा क्या है.