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Showing posts from January, 2016

प्रेम-वासना-बुद्ध

सच यही है,
तुम्हें पहली बार देखते ही
जो भावनायें उठीं उस में प्रेम और वासना दोनों थे
परन्तु एक आकर्षण जो तुम्हारे चेहरे पर था
वो तुम्हारे भीतर के गहरे प्रेम का आकर्षण था
तुम्हारे प्रेम की ऊष्मा में तिरोहित हो जाते है वासना के विकार
और जब मै तुम्हें देखता हूं सौम्य निश्छल चेहरे को
तुम्हारे भीतर बैठे बुद्ध को
और फिर जो घटित होता है, वो आँखो से बहती अश्रुधार
मैं समझ पाता हूँ तुम्हारे क़रीब आने के लिये
प्रकृति द्वारा रचित वासना रूपी कारक को
और उस के पीछे प्रकृति के मूल प्रेम को
जो  आदि से अनंत तक हमारा अस्तित्व है

जिंदगी-ट्रेन-लड़की-चाय

ट्रेन डब्बा मुसाफिर जिंदगी
तेज धीमी रफ़्तार समय
भागते हांफाते आराम

बैठे तो रेत जैसे जिंदगी
हथेली किसी के हाथ में
फिसल जाता है, हाथ भी रेत सा

सड़क पर नज़रे बचाकर
डरी सहमी सी भागती जिंदगी
पीछे निराशा में डूबे
कुंठित लोगों की फब्तियाँ

कनों मे वो आवाज़ न पड़े
वो दिल को भेदती आवाज़
कड़वाहट और मिठास
जैसे कड़ी पत्ती चाय

जिंदगी बिना दूध कड़ी पत्ती चाय
गरम फिर भी अच्छी है
जैसे भागती रहती हो
रुकी ठंडी हुई और ख़तम

ज़िंदा मुर्दों के देश में

वो रात
जैसे ख़त्म ही न हो रही थी  एक नौजवान की मौत हुई थी  और जैसे सदियों के दर्द से करांहती आत्मायें  नींद से जाग गयीं थीं  और की दर्द की पराकाष्ठा पर क़राह रहीं थी  मैंने उन के शरीर पर कोड़ों के निशान देखे  वही कोड़े जिन से तुम्हारे बाप दादे  घोड़ों के जाबुक का काम लेते थे  सब दर्द से करांहती  लाशें जागी थी  कि एक नौजवान की मानसिक यातनायें  वो अपने भीतर महसूस करने लगी थी  महसूस कर रहीं थी गले पर कसते फंदे से घुटते हुये दम को
और उनकी आँखे और जीभ बाहर आ गये थे दम घुटने से  पर अब वो मानसिक यातनाओं से मुक्ति पा चुकी थीं पर देख रहा हूँ की  शहर  मुर्दा घर हुये पड़े है लोग हैं की लाश की तरह बेसुध है  जैसे कुछ हुआ ही नहीं  वो शायद किसी क़रीबी के मौत पर ही जागते है  और जैसे हम है ज़िंदा मुर्दों के देश में

भाड़ में जाये तुम्हरी ये परम्परायें

सुनो, जब तुम ब्राह्मण कहते हो मुझे
तो मै सदियों से हो रहे दमन
और अत्याचार का हिस्सेदार हो जाता हूँ
पैदा होते ही तुम ने थोप दी है
ये परम्परायें
ये संस्कृति
तो मैं कहता हूँ
भाड़ में जाये
तुम्हरी ये परम्परायें
तुम्हारी तथा कथित हज़ारों साल की संस्कृति
भाड़ में जाये तुम्हारी जाति-धर्म की व्यवस्था
और सुनों जब तुम गर्व करते हो
बुद्ध का नाम ले कर
कबीर का उदाहरण दे कर
तो तुम दुनिया के सबसे घृणित व्यक्ति लगते हो
क्यों की तुम जैसे लोगों ने यहाँ से बुद्ध को संस्कृति और धर्म के नाम पर खदेड़ा था
तुम ने हत्यायें की है
सदियों से हत्यारे हो तुम
और पूरी मानवता लज्जित हो जाती है