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Showing posts from March, 2016

प्रेम

सुनो,
संसार में खोजे बनाये गये सारे शब्द, झूठे हो जाते है,
क्यों की ये सारे शब्द मिल कर भी एक शब्द 'प्रेम' की व्याख्या नहीं कर पाते।
और अंतत: यह शब्द 'प्रेम' भी झूठा हो जाता है,
क्यों की इस शब्द की आवाज़ भी बता नहीं सकती की ये क्या है।
और जब सारे शब्द और विचार को हम छोड़ देते है,
तब गहरे हमारे भीतर जो शून्य बचता है,
वहाँ प्रेम स्थापित कर लेता है खुद को, शब्द से परे, शरीर से परे एक उर्जा के रूप में।
अनंत से अनंत तक फैली उर्जा, जिसे जानने ते लिये उस के अनुभव से गुज़रना होगा, शब्द को छोड़ कर।

मुझे तब तक न कहना होली खेलने को

सुनो,
प्रेम की कहीं हाट लगती हो तो बताना,
बिक जाना चाहता हूँ, उस को पाने के लिये।

या कि,
कही मिलता हो वो रंग, और वो रंगरेज़,
जिस में रंग कर खुद को, भूल कर, खुद को पा लें।

या कि,
कही मिल जाये एक सूत्र,
जिस से मेरे अस्तित्व की समस्त उर्जायें सिमट कर ख़त्म कर दे सारा भ्रम।

सुनो,
मुझे तलाश है।
और एक इंतज़ार भी।

और हाँ, तब तक मुझे होली खेलने को न कहना,
मुझे ये सारे रंग फीके लगते है, सब उतर जाते है।