Thursday, 28 July 2016

वक़्त कभी नहीं ठहरता

पता नहीं तुम्हें अब भी पता है की नहीं
की ज़िंदगी की मुश्किलें
मुझे तुम्हारे और क़रीब ले जातीं है
और अधखुली खिड़की से आती हवा
आधीअधूरी ज़िंदगी में
तुम्हारे होने का एहसास दे जाती है
और अब इन दिनो मुझे ख़्वाबों पर यक़ीन ज्यादे है
वही एक जगह है जहाँ दिन का ज्यादे वक़्त
तुम्हारे साथ गुज़रता है
और अब भी जब होता हूँ मैं
तिराहे के पास वाले, अहाते के कोने पर
पश्मीना शॉल की लाली और तुम्हारे चेहरे की रंगत
जैसे वक़्त के पुराने फ़्रेम में
तुम्हारे आँखों सी पारदर्शी शीशे से जड़ी हुई साफ़ नज़र आती है
और वक़्त जैसे ठहर सा जाता है
पर ये सच है की वक़्त कभी नहीं ठहरता
किसी के लिए भी नहीं

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (29-07-2016) को "हास्य रिश्तों को मजबूत करता है" (चर्चा अंक-2418) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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