प्रेम की परिभाषाएँ

प्रेम की सारी परिभाषाएँ
तुम पर आ कर
पेड़ के पीले पड़ गये पत्तों सी
पतित हो जाती हैं

प्रेम के एक क़तरा अनुभव के आगे
शब्दों का सारा समुद्र
जैसे रेगिस्तान सा लगता है

जीवन की सारी विषमताओं
और कष्टों के अंधेरों के बीच
प्रेम की अकेली किरण
सब कुछ रोशन कर देती है

प्रेम सुबह के ओस सी
पलकों के कोरों पर ठहर जाती है
तो कभी मन चित्त और प्राण में
प्रार्थना बन कर तरंगित हो जाती है

सूक्ष्म अति सूक्ष्म कणों तक
प्रेम आत्मिक अनुभव रूप में
ठहर जाता है जीवंत होकर
जीवन पार की यात्राओं में

Comments

  1. प्रेम को बाखूबी लिखा है ... बहुत उत्तम ...

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