Saturday, 1 April 2017

ज़िंदगी कम है क्या कि मौत की कमी होगी

दुबारा इश्क़ की दुनिया हरी भरी होगी
वो मिल भी जाए तो क्या अब मुझे ख़ुशी होगी - © भाई Irshad Khan Sikandar

अंधेरों के बाद, फिर जो रोशनी के साथ
मिल भी गए तो क्या पहले जैसी ख़ुशी होगी

दुनिया दूर से ख़ूबसूरत जो बहुत है
पास जाने पर भी क्या उतनी ही हँसी होगी

ज़माना पहले अलविदा कहा था जहाँ
अगली मुलाक़ात भी क्या वहीं होगी

आँखो का अश्क़ जो मोहब्बत में ठहर जाता है
तो वक़्त को भी क्या महसूस वो नमीं होगी

तुम सफ़र में हो 'मुसाफ़िर' पूरा कर ही लो
ये ज़िंदगी कम है क्या कि मौत की कमी होगी

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (04-04-2017) को

    "जिन्दगी का गणित" (चर्चा अंक-2614)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    विक्रमी सम्वत् 2074 की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत खूब ... दुनिया दूर से जितनी खूबसूरत है ... काश पास आने से उतनी ही हो ...
    लाजवाब शेरोन से सजी ग़ज़ल है ... बहुत कमाल ...

    ReplyDelete

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